निधन होने पर सफेद कपड़े ही क्यों पहने जाते हैं?
भारतीय समाज विशेष रूप से हिंदू संस्कृति में, किसी व्यक्ति के निधन होने पर सफेद कपड़े पहनने की परंपरा बहुत प्रचलित है। यह परंपरा हजारों वर्ष पुरानी है और इसके मूल में कई प्रकार के आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारण हैं। जबकि दुनिया की कई संस्कृतियाँ शोक के समय काले या गहरे रंग पहनती हैं, भारत में सफेद रंग को शोक का प्रतीक माना जाना एक अत्यंत विशिष्ट और गहरी परंपरा है। आइए इसे विस्तार से समझें।
1. सफेद रंग का आध्यात्मिक अर्थ—पवित्रता, शांति और मोक्ष
सफेद रंग भारतीय संस्कृति में पवित्रता, निर्मलता और शांति का प्रतीक माना जाता है। हिंदू दर्शन के अनुसार मृत्यु अंत नहीं बल्कि एक यात्रा का रूपांतरण है। ऐसा माना जाता है कि जब व्यक्ति देह त्यागता है, तो उसकी आत्मा शरीर से मुक्त होकर एक नई यात्रा पर निकलती है। इस प्रक्रिया में शांति और पवित्रता का भाव आवश्यक माना गया है।
सफेद रंग का संबंध प्रकाश, सात्त्विकता और ईश्वर के समीप जाने की स्थिति से है। शोक के समय सफेद वस्त्र पहनना इस विचार को दर्शाता है कि परिवारजन मृत आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना कर रहे हैं। सफेद रंग का कोई भड़काऊ या राग-द्वेष उत्पन्न करने वाला अर्थ नहीं होता, जिससे मन भी शांत रहता है।
2. वैराग्य और त्याग का प्रतीक
हिंदू धर्म में सफेद रंग को त्याग और वैराग्य का रंग कहा गया है। साधु-संत और तपस्वी अक्सर सफेद या भगवा वस्त्र पहनते हैं क्योंकि यह रंग कामना, मोह और सांसारिक आसक्तियों से दूर होने का प्रतीक है।
शोक के समय परिवारजन भी इसी प्रकार एक वैराग्य की स्थिति में होते हैं। अपने प्रिय व्यक्ति को खोने का दुःख उन्हें थोड़ा समय के लिए सांसारिक इच्छाओं से दूर कर देता है। सफेद वस्त्र पहनना इस मानसिक स्थिति को दर्शाता है—एक ऐसा समय जब जीवन के चमकीले, रंगीन पक्षों से थोड़ी दूरी बनाकर मन को संभालने की आवश्यकता होती है।
3. मनोवैज्ञानिक प्रभाव—सफेद रंग मन को शांत करता है
रंग मनोविज्ञान के अनुसार सफेद रंग व्यक्ति के मन और वातावरण दोनों को शांत करता है। मृत्यु के समय परिवार अत्यंत भावनात्मक और तनावपूर्ण अवस्था में होता है। ऐसे माहौल में सफेद रंग मानसिक शांति और संतुलन प्रदान करने में मदद करता है।
इसके विपरीत, चमकीले या गहरे रंग अधिक ऊर्जा, आवेग और ध्यान आकर्षित करने वाले माने जाते हैं, जो शोक के वातावरण के अनुकूल नहीं होते। सफेद वस्त्रों से साधारणता, सादगी और गंभीरता का भाव पैदा होता है, जो स्थिति के अनुरूप माना जाता है।
4. “अहं” को हटाकर समानता का भाव
शोक के समय परिवार या समुदाय के लोग सभी एक ही जैसे सफेद वस्त्र पहनते हैं। यह एक प्रकार का सामाजिक संदेश भी है—कि दुख के समय सब समान होते हैं। मनुष्य की अन्य पहचानें, सामाजिक स्तर, धन-दौलत या बाहरी भेद मिट जाते हैं। सफेद रंग एक समानता का प्रतीक बन जाता है, जिसमें सब लोग एक ही रंग में एक दूसरे के दुःख में सहभागी होते हैं।
5. मृत्यु को ‘शुद्धि’ की प्रक्रिया माना जाना
वैदिक परंपरा में मृत्यु के बाद परिवार के लिए एक प्रकार की शुद्धि की अवधि मानी जाती है, जिसे संस्कृत में “सूतक” कहा जाता है। इस समय व्यक्ति का मन और शरीर दोनों एक संवेदनशील अवस्था में होते हैं। सफेद वस्त्र, जो शुद्धता का प्रतीक हैं, इस अवधि के सामंजस्य के अनुसार माने गए हैं।
अक्सर संस्कारों में भी सफेद रंग का प्रयोग होता है—जैसे यज्ञ में सफेद आसन, पूजा में सफेद पुष्प, और देवताओं को भी कुछ विशेष अवसरों पर सफेद वेशभूषा अर्पित की जाती है। इसलिए मृत्यु संस्कार में सफेद पहनना भी इसी शुद्धता के सिद्धांत से जुड़ा हुआ है।
6. भौतिक और पर्यावरणीय कारण (ऐतिहासिक दृष्टि से)
भारत जैसे गर्म जलवायु वाले देश में सफेद रंग अधिक सुविधाजनक भी माना गया। सफेद कपड़े सूरज की गर्मी को कम अवशोषित करते हैं, जिससे शरीर अपेक्षाकृत ठंडा रहता है। प्राचीन समय में मृत्यु संस्कार, अंतिम यात्रा और दाह-संस्कार अक्सर खुली धूप में होते थे, इसलिए सफेद वस्त्र पहनना व्यावहारिक भी था।
साथ ही, पहले कपड़े प्राकृतिक कपास से बनाए जाते थे जिनमें सफेद रंग सबसे सादा और आसान रूप माना जाता था। इसे रंगने की आवश्यकता नहीं होती थी, जिससे यह सादगी और शोक दोनों का उपयुक्त प्रतीक बन गया।
7. छोटे या बड़े आयोजन से दूरी का संकेत
मृत्यु के समय परिवार उत्सव, सजावट, धूमधाम या किसी भी प्रकार के उल्लास से दूर रहता है। सफेद कपड़े पहनकर यह दर्शाया जाता है कि यह समय आंतरिक चिंतन, मनन और स्मरण का है—न कि उत्सव का। रंगीन कपड़े अक्सर खुशी, उत्सव और ऊर्जा का प्रतीक होते हैं, इसलिए उन्हें जानबूझकर शोक के दौरान त्याग दिया जाता है।
8. समाज में अनुशासन और सामूहिकता बनाए रखना
भारतीय समाज में मृत्यु-संस्कार एक सामूहिक प्रक्रिया है। रिश्तेदार, पड़ोसी, समाज के सदस्य सभी इसमें शामिल होते हैं। ऐसे समय में एक ही रंग पहनना सामाजिक एकता और अनुशासन का प्रतीक भी है। यह सामूहिक रूप से व्यक्ति की विदाई को गंभीरता और सम्मान प्रदान करता है।
9. हिंदू धर्म के ‘गुण’ सिद्धांत से संबंध
हिंदू धर्म में प्रकृति को तीन गुणों में बाँटा गया है—
- सत्त्व (शांत, पवित्र, प्रकाश)
- रजस (क्रिया, ऊर्जा, लालसा)
- तमस (अंधकार, आलस्य, भ्रम)
सफेद रंग को सात्त्विक माना गया है, जबकि काला रंग तामसिक माना जाता है। चूंकि मृत्यु के बाद आत्मा को प्रकाश और शांति की ओर अग्रसर माना जाता है, इसलिए सफेद रंग इस आध्यात्मिक दिशा का प्रतीक बन जाता है।
10. समय के साथ बनी सामाजिक प्रथाएँ
कई बार परंपराएँ समाज में इतनी गहराई से रच-बस जाती हैं कि उनका पालन करना सदियों से चली आ रही सामूहिक आदत जैसा बन जाता है। शोक के समय सफेद वस्त्र पहनना भी ऐसी ही सामाजिक परंपरा है। आज चाहे लोग इसके धार्मिक कारणों को जानें या न जानें, फिर भी अधिकांश लोग इसे सामाजिक रूप से उपयुक्त मानकर अपनाते हैं।
निष्कर्ष
शोक के समय सफेद कपड़े पहनना केवल एक धार्मिक रीति नहीं, बल्कि एक बहुआयामी परंपरा है। इसमें पवित्रता, शांति, त्याग, मानसिक संतुलन, सामाजिक समानता और संस्कृति—इन सभी तत्वों का मेल है।
सफेद रंग व्यक्ति को भीतर से शांत करता है, मन को संयमित करता है और यह दर्शाता है कि यह समय आत्मचिंतन और प्रियजन की स्मृति को सम्मान देने का है।
इस प्रकार सफेद वस्त्र पहनना सिर्फ कपड़ों का चयन नहीं, बल्कि एक गहरी मानवीय और सांस्कृतिक संवेदना का प्रतीक है।
