शिव के तेज से जन्मे जलंधर की भूली-बिसरी कथा
भारतीय पौराणिक कथाओं में ईश्वर और देवताओं से जुड़े अनगिनत चरित्र मिलते हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी योद्धा हैं जिनकी कहानियाँ समय की धूल में दब गईं। उन्हीं में से एक है जलंधर, एक अद्भुत योद्धा, जो न सिर्फ़ अपार शक्ति का स्वामी था, बल्कि उसका जन्म स्वयं भगवान शिव के तेज (अग्नि-ज्वाला) से हुआ था। आज उसकी कहानी बहुत कम लोग जानते हैं, जबकि उसके जीवन और मृत्यु से जुड़ी घटनाओं ने देवताओं और असुरों के इतिहास की दिशा बदल दी थी।
इस लेख में हम जानेंगे—
✔ जलंधर कौन था?
✔ उसका जन्म शिव के क्रोध से कैसे हुआ?
✔ क्यों देवता भी उससे भयभीत थे?
✔ पार्वती और शिव का क्या था उससे संबंध?
✔ आखिर उसका अंत कैसे हुआ?
🌋 जलंधर का जन्म—शिव के तीसरे नेत्र से उठी ज्वाला
कथाओं के अनुसार, एक समय देवताओं और असुरों के बीच भयंकर युद्घ चला। देवताओं पर संकट बढ़ रहा था। इसी दौरान ब्रह्मांड में एक घटना हुई जिसने असुरों की शक्ति को कई गुना बढ़ा दिया।
जब इंद्र ने अहंकार में भरकर भगवान शिव का अपमान किया, तब शिव के तीसरे नेत्र से तीव्र अग्नि ज्वाला निकली। यह अग्नि इतनी प्रचंड थी कि देवता, ऋषि, यहाँ तक कि स्वयं इंद्र भी इससे भयभीत हो गए। कहानी में बताया गया है कि यह ज्वाला धरती में गिरकर समुद्र तक पहुँची।
समुद्र देव ने उस दिव्य ज्वाला को अपने गर्भ में समा लिया, और उसी तेज से जन्म हुआ—
🔥 जलंधर का—समुद्र का पुत्र, पर शिव की ज्वाला का अवतार
यही कारण है कि उसे ‘जल’ + ‘अंधर’, यानी ‘जल से उत्पन्न’ कहा गया।
👑 जलंधर—एक वीर, सुंदर और अजेय योद्धा
जलंधर जैसे ही बड़ा हुआ, उसकी शक्ति असुरों से भी अधिक हो गई। वह इतना तेजस्वी और सुंदर था कि देवताओं से भी उसकी तुलना की जाने लगी। कहा जाता है कि वह—
- युद्ध-कौशल में अद्वितीय
- महापराक्रमी
- अपार शक्ति वाला
- अपने लोगों का संरक्षक
- और सबसे बड़ी बात—धर्म और सत्य का पालन करने वाला
वह अन्य असुरों जैसा अत्याचारी नहीं था। बल्कि अपने साम्राज्य में न्याय की स्थापना करना चाहता था।
❤️ विवाह वृंदा से — उसके जीवन का सबसे पवित्र अध्याय
जलंधर का विवाह वृंदा नामक अत्यंत पवित्र और सदाचारी स्त्री से हुआ। वृंदा जालंधर की शक्ति और विजय का मुख्य कारण थी। उसकी पतिव्रता-शक्ति ने जलंधर को युद्ध में अजेय बना दिया।
कहा जाता है—
जब तक वृंदा का पतिव्रत अटूट रहा
तब तक जलंधर को कोई देवता पराजित नहीं कर सका।
⚔ देवताओं से संघर्ष—स्वर्ग लोक हिलाने वाला युद्घ
जलंधर जैसे-जैसे शक्तिशाली हुआ, असुरों का साम्राज्य भी मजबूत होने लगा। इससे देवता चिंतित हो उठे। दूसरी ओर जलंधर मानता था कि देवताओं ने अन्याय किया है और कई बार अहंकार में भरकर कमजोरों का शोषण भी किया।
इस प्रकार दोनों पक्षों में तनाव बढ़ा और फिर शुरू हुआ—
देवताओं और जलंधर के बीच महान युद्घ
देवताओं ने कई बार आक्रमण किया, पर हर बार पराजित हुए। यहाँ तक कि इंद्र, वरुण, अग्नि, वायु — सभी उसकी शक्ति के सामने टिक नहीं सके।
🌺 पार्वती से मोह—युद्घ की दिशा बदलने वाला प्रसंग
कथाओं का एक दिलचस्प अध्याय यह है कि जलंधर ने अपने शौर्य के कारण यह मान लिया कि उसे देवताओं के समान ही सम्मान मिलना चाहिए। इसी दौरान उसकी दृष्टि गिर गई भगवान शिव की पत्नी, माता पार्वती पर।
कुछ कथाओं के अनुसार, असुरों ने जलंधर को उकसाया कि “पार्वती जैसी देवी के पति को मारकर तुम देवताओं पर शासन कर सकते हो।”
इससे शिव अत्यंत क्रोधित हुए। जलंधर ने पार्वती को प्राप्त करने की कोशिश की, जो उसके अंत का कारण बना।
⚡ शिव से टकराव—जब दो महाशक्तियाँ आमने-सामने आईं
अब यह स्पष्ट हो चुका था कि जलंधर का अंत केवल शिव के हाथों ही लिखा है। क्योंकि—
- उसका जन्म शिव के तेज से हुआ था
- उसकी शक्ति भी उसी दिव्य ऊर्जा से जुड़ी थी
- और उसका अभिमान अब देव और ऋषियों के लिए खतरा बन चुका था
शिव ने कार्तिकेय और गणों को आदेश दिया, और देवताओं की सहायता करते हुए स्वयं युद्धभूमि पहुँचे।
शिव और जलंधर के युद्ध का वर्णन अद्भुत है—
- आकाश कंपा
- धरती डोल उठी
- समुद्र की लहरें उफान पर आ गईं
- असुर और देवता भय से कांप उठे
जलंधर शिव का तेज सहने में सक्षम था, पर उसकी रक्षा वृंदा के पतिव्रत से हो रही थी।
💔 वृंदा का छल—और जलंधर की शक्ति का नाश
जलंधर को पराजित करने का कोई उपाय नहीं था, क्योंकि वृंदा की पतिव्रता-शक्ति उसे अजेय बनाए हुए थी।
देवताओं ने विष्णु से सहायता माँगी। विष्णु ने एक युक्ति बनाई। उन्होंने जलंधर का रूप धारण किया और वृंदा के पास पहुँच गए। वृंदा को भ्रम हो गया कि यह उसका पति है, और उसका पतिव्रत भंग हो गया।
पतिव्रत के टूटते ही—
जालंधर की रक्षा-शक्ति नष्ट हो गई।
वृंदा को जब सत्य पता चला, उसने विष्णु को श्राप दिया—
कि तुम भी अपने प्रिय से विरह झेलोगे।
कथा अनुसार, यही श्राप आगे चलकर सीता हरण और राम-विष्णु अवतार के दुख का कारण माना गया।
🗡 अंत—शिव द्वारा जलंधर का वध
अब जलंधर असुरक्षित था।
शिव ने त्रिशूल उठाया और प्रचंड वेग से वार किया। इस बार जलंधर का शरीर समुद्र के पास गिरा। उसका तेज आकाश में फैल गया और उसका अंत हुआ।
छिन्न-विच्छिन्न शरीर समुद्र में गिरा, और माना जाता है कि—
समुद्र ने अपने पुत्र को फिर अपनी गोद में समा लिया।
🌼 जलंधर का अंतिम अध्याय — वृंदा का परिवर्तन
वृंदा, जो जालंधर से अत्यंत प्रेम करती थी, उसके वध और अपने साथ हुए छल से दुखी होकर योगाग्नि में भस्म हो गई।
कथाओं के अनुसार, उसकी राख से ही ‘तुलसी’ का पौधा प्रकट हुआ। इसलिए तुलसी को पवित्र और देवी स्वरूप माना जाता है।
📜 जलंधर की कथा क्यों भूली-बिसरी है?
हालाँकि जालंधर अत्यंत वीर और धर्मशील था, पर उसकी कहानी पुराणों के अन्य बड़े आख्यानों में दब गई। वह न तो दैत्य-राज हिरण्यकश्यप जैसा अत्याचारी था और न रावण जैसा प्रसिद्ध। उसकी शक्ति, जन्म और मृत्यु अद्भुत थे, पर कहानी कम सुनाई गई।
लेकिन यह सच है—
जलंधर का जीवन एक ऐसी कथा है जिसमें साहस, प्रेम, धर्म, छल, शक्ति और विनाश सब कुछ शामिल है।
🔍 निष्कर्ष—शिव के तेज से जन्मा, शिव के तेज से लौटा
जलंधर की पूरी कहानी हमें यह सिखाती है कि—
- दिव्य शक्ति का अहंकार विनाशकारी होता है
- सत्य और पतिव्रत की शक्ति देवताओं तक को प्रभावित करती है
- छल का परिणाम अंततः विनाश लाता है
- जन्म और मृत्यु एक ही स्रोत से जुड़े होते हैं
जलंधर शिव के तेज से जन्मा, और अंततः शिव के ही तेज से उसकी मृत्यु हुई।
यह भूल चुकी कथा आज भी पौराणिक इतिहास का एक अनोखा अध्याय है, जिसे जानना उतना ही रोचक है जितना इसका रहस्य।
